विशेष रिपोर्ट

विशेष रिपोर्ट (7)

 

फ्रेंच राजनीति विज्ञानी क्रिस्तोफ़ जाफ़्रलो की किताब ‘भीमराव अंबेडकर - एक जीवनी’ के कुछ अंश. मूलरूप से फ्रेंच में लिखी गई इस किताब का हिंदी अनुवाद योगेंद्र दत्त ने किया है और इसका प्रकाशक राजकमल प्रकाशन है.संविधान सभा की बहसों में एक पश्चिम प्रेरित सिविल कोड अपनाने की सिफ़ारिश करके और निजी क़ानूनों के लिए आवाज़ उठा रहे प्रतिनिधियों, जिनमें शरीअत के भविष्य को लेकर चिन्ताग्रस्त मुस्लिम प्रतिनिधि विशेष रूप से मुखर थे, का विरोध करते हुए भारतीय समाज को सुधारने के मामले में अंबेडकर ने अपनी दृढ़ता का साफ़ परिचय दिया: ‘मैं निजी तौर पर यह यह नहीं समझ पाता कि धर्म को इतना व्यापक, इतना सर्वसमावेशी अधिकार क्यों दे दिया जाता है कि पूरा जीवन उसके खोल में आ जाता है और यहां तक कि विधायिका भी उस दायरे में घुसपैठ नहीं कर सकती. आख़िरकार हमें यह मुक्ति मिली ही क्यों है? हमें यह मुक्ति इसलिए मिली है कि हम अपनी सामाजिक व्यवस्था को सुधार सकें जो कि ग़ैर-बराबरी, भेदभाव और दूसरी चीज़ों से भरी पड़ी है और ये सारी प्रवृत्तियां हमारे मौलिक अधिकारों के विरुद्ध हैं.’इसके बदले में अंबेडकर को नीति निर्देशक सिद्धान्तों में एक अनुच्छेद से ज़्यादा कुछ नहीं मिला जिसमें कहा गया था कि: ‘भारत के समूचे भू-भाग में राज्य अपने नागरिकों के लिए एक यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड सुनिश्चित करने के लिए प्रयास करेगा.’बाद में यह सिफ़ारिश एक बेजान प्रस्ताव भर बनकर रह गई क्योंकि अल्पसंख्यकों—सबसे मुख्य रूप से मुस्लिमों—ने अपने-अपने निजी क़ानूनों को लेकर एक सख़्त रवैया अपना लिया था. कांग्रेस के भी बहुत सारे सदस्य भी उत्तराधिकार, विवाह (और तलाक़) तथा दत्तकता सम्बन्धी हिन्दू परम्पराओं व व्यवहारों में किसी भी प्रकार के सुधारों के ख़िलाफ़ थे. हिन्दू कोड बिल का अन्तत: जो हश्र हुआ, उससे यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है.ऊपर उद्धृत वाक्य हिन्दू समाज की परम्पराओं को सुधारने की दीर्घकालिक परियोजना की ओर संकेत करता है. सती उन्मूलन (1929) से लेकर हिन्दू महिला सम्पत्ति अधिकार अधिनियम (1937) तक एक सदी से भी ज़्यादा समय में बनाए गए अलग-अलग क़ानूनों के बाद अंग्रेज़ों ने तय किया कि सारे संशोधित हिन्दू निजी क़ानूनों को एक कोड में समेकित कर दिया जाए तो बेहतर होगा. लिहाज़ा 1941 में एक हिन्दू लॉ कमेटी बनाई गई थी. बीएन राऊ की अध्यक्षता में गठित इस कमेटी ने 1944 के अगस्त महीने में हिन्दू कोड का एक मसविदा भी प्रकाशित किया था. इस मसविदे के मुख्य प्रावधानों के अनुसार, बेटियों और बेटों को माता-पिता की मृत्यु पर उत्तराधिकार मिलना चाहिए, विधवाओं को निर्बाध सम्पदा (एब्सॉल्यूट ऐस्टेट) का अधिकार मिलना चाहिए. एकल विवाह को नियम बनाया गया था और निश्चित हालात में तलाक़ की भी अनुमति दी गई थी. अप्रैल 1947 में इस कोड को विधायिका के सामने पेश किया गया लेकिन राजनीतिक हालात—आज़ादी और विभाजन—की वजह से इसकी विषयवस्तु पर कोई चर्चा नहीं हो पाई थी.1948 में नेहरू ने एसेम्बली की एक उपसमिति को नये कोड का मसविदा लिखने का जिम्मा सौंपा और अंबेडकर को उसका मुखिया नियुक्त किया. नये कोड बिल में सम्पत्ति और दत्तकता के सवालों पर पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता का प्रावधान किया गया, केवल एकल विवाह (मॉनोगेमस मैरेज) को ही क़ानूनी मान्यता दी गई, ‘सिविल मैरिज में जाति बन्धन को समाप्त’ घोषित किया गया, और तलाक़ की याचिका दायर करने के लिए ठोस औचित्य की आवश्यकता निर्धारित की गई. अभी तक पति द्वारा पत्नी को छोड़ दिए जाने को ही तलाक़ मान लिया जाता था. हिन्दुओं की निजी जि़ंदगी में प्रचलित प्रथाओं पर सवाल खड़ा करने से भावनाओं में भारी उथल-पुथल पैदा हुई. इससे न केवल हिन्दू महासभा के परम्परावादी सदस्यों बल्कि राजेन्द्र प्रसाद सहित कांग्रेस के भी बहुत सारे नेताओं में खलबली मच गई थी.ऐसे सुधारों पर ख़ुद अपनी सख़्त आपत्ति व्यक्त कर चुके वल्लभभाई पटेल को लिखे एक पत्र में राजेन्द्र प्रसाद ने इसे ऐसी परियोजना बताया जिसकी ‘नई अवधारणाएं और नए विचार न केवल हिन्दू क़ानून के लिए पराये हैं बल्कि प्रत्येक परिवार को तोड़ने वाले हैं.‘ पार्टी अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया सहित कांग्रेस के बहुत सारे बड़े नेताओं ने विधेयक का विरोध किया और यह आशंका व्यक्त की कि यह क़ानून 1951-52 के आम चुनावों से पहले स्थानीय प्रभुओं—मुख्य रूप से रूढ़िवादी जमीदारों—को पार्टी से दूर कर सकता है. प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से तो इस तरह के तर्क नहीं दिए मगर वह व्यक्तिगत स्तर पर विधेयक के ख़िलाफ़ अभियान चलाते रहे. उनका कहना था कि अन्तरिम संसद सदस्यों के पास ऐसे मुद्दों पर विचार करने का जनादेश नहीं है.जवाहरलाल नेहरू को इस कोड से भारी उम्मीदें थीं. अंबेडकर की भांति नेहरू भी इसे भारत के आधुनिकीकरण की आधारशिला मानते थे. उन्होंने यहां तक ऐलान किया था कि अगर यह बिल पास नहीं होता है तो उनकी सरकार इस्तीफ़ा दे देगी और अंबेडकर ने उन पर दबाव बनाया था कि वे बिना कोई समय गंवाए इस बिल को संसद के सामने पेश करें. प्रधानमंत्री ने अंबेडकर से थोड़ी मोहलत मांगी और कोड को अलग-अलग चार हिस्सों में बांट दिया ताकि 17 सितम्बर, 1951 को असेम्बली में उसे पेश करने से पहले उस पर हो रहे विरोध को कुछ शान्त किया जा सके. ख़ैर, असेम्बली में इस बिल को पेश किए जाने के बाद इस पर जो बहस हुई उससे यह साफ हो गया कि खुद परम्परावादी कांग्रेसी भी इसके कम ख़िलाफ़ नहीं थे.चार दिन की चर्चाओं के बाद अंबेडकर ने एक भावुक और लम्बा भाषण दिया जिसमें उन्होंने बताया कि कृष्ण और राधा का विवाहेतर सम्बन्ध दर्शाता है कि हिन्दू धर्म में महिलाओं को कितनी अपमानजनक स्थिति में रखा जाता है. अचंभे की बात नहीं है कि इससे ज़्यादातर रूढ़िवादी सांसद आगबबूला हो गए. टी. भार्गव ने दावा किया है कि अंबेडकर इस क़ानून को इसलिए पारित कराना चाहते थे ताकि एक ब्राह्मण नर्स के साथ अपने हालिया विवाह को वैधता प्रदान कर सकें. अंबेडकर ने अप्रैल 1948 में ही डॉ. शारदा कबीर से विवाह किया था. 1947 में जब ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष के रूप में लगातार व्यस्तता के कारण उनकी तबीयत तेज़ी से बिगड़ने लगी थी तो वह डॉ. कबीर से इलाज कराने गए थे.ख़ैर, 25 सितम्बर को हिन्दू कोड बिल के विवाह और तलाक से सम्बन्धित हिस्से में बहुत सारे संशोधनों के ज़रिए उसको क्षत-विक्षत कर दिया गया और अन्तत: उसे हमेशा कि लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. नेहरू ने इस घटनाक्रम के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कहा. अंबेडकर का मानना था कि प्रधानमंत्री ने इस मौक़े पर उनका उतना समर्थन नहीं किया जितना करना चाहिए था, लिहाज़ा 27 सितम्बर को उन्होंने नेहरू सरकार से इस्तीफ़ा दे दिया.कुछ समय बाद प्रकाशित अपने एक वक्तव्य में अंबेडकर ने नेहरू के पीछे हट जाने के लिए कांग्रेस के भीतर से पड़ रहे दबाव को जि़म्मेदार ठहराया : ‘मैंने कभी किसी चीफ़ व्हिप को प्रधानमंत्री के प्रति इतना निष्ठारहित और प्रधानमंत्री को एक निष्ठाहीन व्हिप के प्रति इतना निष्ठावान नहीं देखा.‘ नेहरू को शायद डर था कि कहीं ऐसा न हो कि कांग्रेसी सांसद ही सामूहिक रूप से इस पूरी परियोजना को ख़ारिज कर दें और/या गणराज्य के राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने इस पर हस्ताक्षर न करने की जो धमकी दी थी, उसे वे वाक़ई अमल में न ले आएं.हिन्दू कोड बिल अंबेडकर द्वारा बताई गई अपने इस्तीफ़े की वजहों में से सिर्फ़ एक वजह थी. वह इस बात के लिए भी नेहरू से ख़फ़ा थे कि उन्होंने अंबेडकर को किसी भी तरह के योजना सम्बन्धी मंत्रालय नहीं दिए थे. अंबेडकर कश्मीर के मामले पर भी नेहरू से सहमत नहीं थे. अंबेडकर का मानना था कि यह भूभाग पाकिस्तान को ही मिलना चाहिए. इन सारी घोषित वजहों के अलावा एक अव्यक्त कारण भी था—स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव निकट आ रहे थे और अंबेडकर अपनी पार्टी की ओर से ही चुनाव लड़ना चाहते थे.फिर भी, यह बेहद उल्लेखनीय बात है कि अंबेडकर ने नेहरू सरकार का दामन हिन्दू कोड बिल के सवाल पर ही छोड़ा. इससे पता चलता है कि यद्यपि वह ऊपर से लागू किए जा रहे समाज सुधारों के राजनीतिक रास्ते में विश्वास रखते थे मगर ये भी समझते थे कि यह कोशिश केवल संवैधानिक रूपरेखा तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए. वह मानते थे कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक रिवाजों को बदलने में तब तक सफलता नहीं मिलेगी जब तक व्यवहार के धरातल पर इसके लिए ठोस उपाय नहीं किए जाएंगे. बहुत सारे कांग्रेसी भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक रूपरेखा को तो स्वीकार कर रहे थे मगर वे सामाजिक यथास्थिति पर सवाल उठाने वाले बदलावों का समर्थन करने को तैयार अभी भी नहीं थे.तीस के दशक के आख़िरी सालों से पचास के दशक तक अंबेडकर अपनी सारी ताक़त अस्पृश्यों के हालात को सुधारने के लिए झोंकते रहे. सबसे पहले तो उन्होंने अस्पृश्यों—और यहां तक कि तमाम मजदूरों—के हितों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलों का गठन किया. इसके बाद उन्होंने अपने तबके के लोगों के पक्ष में कुछ आश्वासनों के बदले अंग्रेज़ों का साथ दिया और अन्त में इसी भावना व उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए वह कांग्रेस सरकार में शामिल हुए. इस पूरी पद्धति से उन्हें गांधीवादी विचारों को हाशिए पर रखने में निश्चित रूप से मदद मिली. अगर अंबेडकर ने ये सब न किया होता तो संविधान के अन्तिम पाठ में गांधीवादी विचारों की छाप बहुत गहरी होती. मगर दूसरी तरफ़ उन्होंने पृथक निर्वाचक मंडल और ख़ासतौर से हिन्दू कोड बिल पर हुई बहसों के दौरान राजतंत्र में अपने प्रभाव और पैठ की सीमाओं को भी परख लिया था. उन्होंने हिन्दू कोड बिल को अपने संघर्ष का आधार इसलिए बनाया क्योंकि उनका मानना था कि आधुनिक संवैधानिक संरचना के साथ-साथ भारतीय समाज को आमूल समाज सुधारों की भी सख़्त ज़रूरत है, और कांग्रेस इन सुधारों के लिए अभी तैयार नहीं थी.यों तो उन्होंने नेहरू सरकार से इस्तीफ़ा देने के बाद राजनीति के प्रति एक ख़ास तरह की हिकारत का भाव भी दिखाया मगर कुल मिलाकर वह राजनीतिक जीवन से बाहर जाने वाले नहीं थे. न केवल उन्होंने 1951-52 के चुनाव अभियान में हिस्सा लिया बल्कि कुछ साल बाद, अपनी मृत्यु से ठीक पहले रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया की स्थापना का विचार भी हवा में छोड़ दिया था. इसी दौरान उनके धार्मिक, यहां तक कि आध्यात्मिक अन्वेषण की दिशा भी बौद्ध धर्म पर केन्द्रित होती गई. उनके विचार में यही ऐसा धर्म था जहां अस्पृश्यता का एकमात्र स्वीकार्य समाधान सम्भव था.

 

 

मेल उन चीजों में बनाना होता है जिनमें कोई विरोध हो। धर्म और विज्ञान में तो कोई विरोध नहीं है। इसलिए मेल बनाने की बात ही फिजूल। दो चीजों में दुश्मनी हो तो दोस्ती करवानी होती है, लेकिन दुश्मनी ही न हो तो, तो दोस्ती का सवाल क्या? धर्म और विज्ञान में विरोध नहीं है, विज्ञान और अंधविश्वास में विरोध है। और अंधविश्वास धर्म नहीं है। अंधविश्वास को ही क्योंकि हम धर्म समझते रहे हैं, तो इसलिए कठिनाई खड़ी हो गई। अन्यथा धर्म से ज्यादा वैज्ञानिक तो और कोई चीज नहीं है। विज्ञान तो एक पद्धति है, एक मेथड है सत्य की खोज का। जब उस पद्धति का हम उपयोग करते हैं पदार्थ के लिए तो साइंस जन्म जाती है और जब उसी पद्धति का उपयोग करते हैं हम चेतना की खोज में तो धर्म जन्म जाता है। विज्ञान का एक प्रयोग साइंस है, दूसरा प्रयोग धर्म है। विज्ञान एक पद्धति है, साइंटिफिक एटिट््यूड, वैज्ञानिक दृष्टिकोण देखने का एक ढंग है। लेकिन यह प्रश्न इसीलिए उठ आया होगा तुम्हारे मनों ने क्योंकि जिसे हम धर्म कहते हैं वह विज्ञान से बड़े विरोध में मालूम पड़ता है। तो स्मरण रखना, वह धर्म ही नहीं है जो विज्ञान के विरोध में पड़ जाता हो। वह होगा कोई अंधापन। कोई सुपरस्टीशन और अंधविश्वास विज्ञान के मार्ग में ही बाधा नहीं है, धर्म के मार्ग में भी बाधा है। इसलिए दुनिया में बढ़ रही वैज्ञानिक रुचि उस सारे धर्म को जला कर नष्ट कर देगी जो धर्म नहीं है। और इस वैज्ञानिक क्रांति से गुजर जाने के बाद जो शेष रह जाएगा वही खरा सच्चा सोना होगा, वही धर्म होगा। विरोध नहीं है इन दोनों बातों में। और दुनिया के जो लोग सच में धार्मिक थे उनसे ज्यादा वैज्ञानिक आदमी खोजना कठिन है। महावीर, या बुद्ध, या क्राइस्ट इनसे ज्यादा वैज्ञानिक मनुष्य खोजना कठिन है। इन्होंने विज्ञान की खोज अपनी ही चेतना पर की, खुद के भीतर जो रहस्य छिपा है उसे जानना चाहा। रहस्य बाहर ही नहीं है, भीतर भी है। पत्थर-कंकड़ में, पानी में, मिट्टी में ही रहस्य नहीं है, रहस्य मुझमें भी है। हमारे भीतर भी कुछ है तो हम पदार्थ को ही जानते रहेंगे या उसको भी जो हमारे भीतर छिपी हुई चेतना है, जीवंत है? जिसे हम अभी विज्ञान करके जानते हैं वह जो बाहर है उसे खोजता है। और जिसे हम धर्म करके जानते हैं वह उसे जो भीतर है। आज नहीं कल दोनों की खोज एक हो जाने वाली है। यह खोज बहुत दिन तक दो नही रह सकती। तब दुनिया में वैज्ञानिक पद्धति होगी। उसके दो प्रयोग होंगेः पदार्थ पर और परमात्मा पर।
निश्चित ही तथाकथित धर्म इसके विरोध में खड़े होंगे। वे इसलिए खड़े होंगे कि हिंदू और मुसलमान, जैन और ईसाई, अगर विज्ञान का प्रयोग हुआ आत्मा के जीवन में भी तो ये सब नहीं बच सकेंगे। धर्म बचेगा, हिंदू नहीं बच सकेगा, मुसलमान, जैन, ईसाई नहीं बच सकेगा। क्योंकि विज्ञान जिस दिशा में भी काम करता है वही युनिवर्सल पर, सार्वलौकिक पर पहुंच जाता है। कोई हिंदू गणित हो सकता है, या मुसलमान कैमिस्ट्री हो सकती है, या ईसाई फिजिक्स हो सकती है? कोई हंसेगा अगर कोई यह कहेगा कि मुसलमानों की फिजिक्स अलग, हिंदुओं की अलग, तो हम हंसेंगे, हम कहेंगे, तुम पागल हो। पदार्थ के नियम तो वही हैं, एक ही हैं सारी दुनिया में, सब लोगों के लिए, तो एक ही फिजिक्स है, न हिंदुओं की अलग है, न मुसलमानों की, न ईसाईयों की। धर्म भी कैसे अलग-अलग हो सकते हैं? जब पदार्थ के नियम एक हैं, तो परमात्मा के नियम कैसे अलग-अलग हो सकते हैं? जो बाहर की दुनिया है जब उसके नियम सार्वलौकिक हैं, युनिवर्सल हैं, तो मनुष्य के भीतर जो चेतना छिपी है, जीवन छिपा है, उसके नियम भी अलग-अलग नहीं हो सकते, उसके नियम भी एक ही होंगे। इसलिए वैज्ञानिक धर्म के जन्म में ये तथाकथित धर्म सब बाधा बने हुए हैं। वे नहीं चाहते कि वैज्ञानिक धर्म का जन्म हो। साइंटिफिक रिलीजन का जन्म दुनिया के सभी संप्रदायों की मृत्यु की घोषणा होगी। इसलिए वे विरोध में हैं। इसलिए वे विज्ञान के विरोध में हैं। क्योंकि वैज्ञानिकता का अंतिम प्रयोग उन सबको बहा ले जाएगा और समाप्त कर देगा। और मुझे तो लगता है इससे शुभ घड़ी दूसरी नहीं हो सकती। कि ये सब बह जाएं, दुनिया से संप्रदाय बह जाएं--हिंदू, मुसलमान, जैन, ईसाई का फासला बह जाए, आदमी बच रहे। क्योंकि इस फासले ने बहुत खतरा पैदा कर दिया है, इस फासले ने मनुष्य को मनुष्य से तोड़ दिया है। और जो चीज मनुष्य को मनुष्य से ही तोड़ देती हो वह चीज मनुष्य को परमात्मा से कैसे जोड़ सकेगी? वह नहीं जोड़ सकती। इसलिए धर्मों के नाम पर जो कुछ हुआ है, चर्च और मंदिर और शिवालय ने जो कुछ किया है, उसने मनुष्य को कल्याण और मंगल की दिशा नहीं दी, बल्कि हिंसा, रक्तपात, युद्ध और घृणा का मार्ग दिया है। सारी जमीन पर मनुष्य मनुष्य को एक-दूसरे का दुश्मन बना दिया है। धर्म तो प्रेम है, लेकिन धर्मों ने तो घृणा सिखा दी। धर्म तो सबको एक कर देता, लेकिन धर्मों ने तो सबको तोड़ दिया है।
एक छोटी सी घटना मैं तुम्हें कहूं, शायद उससे मेरी बात समझ में आ जाए। एक काले आदमी ने एक चर्च के द्वार पर संध्या जाकर द्वार खटखटाया, पादरी ने द्वार खोला, लेकिन देखा काला आदमी है, वह चर्च तो सफेद लोगों का था, काले आदमी के लिए उस चर्च में कोई जगह न हो सकती थी। पुराने दिन होते तो वह पादरी उसे हटा देता और कहता कि यहां तुमने आने की हिम्मत कैसे की? तुम्हारी छाया पड़ गई इन सीढ़ियों पर, सीढ़ियां अपवित्र हो गईं, इन्हें साफ करो। उसकी हत्या भी की जा सकती थी। ऐसे शूद्रों के कानों में तथाकथित धार्मिक कहे जाने वाले दुष्ट लोगों ने सीसा पिघलवा कर भरवा दिया है जिन्होंने जाकर मंदिर के पास खड़े होकर वेद-मंत्र सुन लिए हों। क्योंकि शूद्रों के कान पवित्र वेद-मंत्रों को सुनने के लिए नहीं हैं। ऐसे आदमियों की छाया पड़ जाना भी पाप और अपराध रहा है इस देश में भी, इस देश के बाहर भी। पुराने दिन होते तो शायद उस काले आदमी की जिंदगी खतरे में पड़ जाती। लेकिन दिन बदल गए हैं, लेकिन आदमी का दिल तो नहीं बदला। उस पादरी ने कहाः मित्र, यह शब्द बिलकुल झूठा रहा होगा, क्योंकि जो उसके इरादे थे वे मित्र के बिलकुल नहीं थे। लेकिन उसने कहाः मित्र, जैसे हम सब झूठी भाषाएं बोलते हैं, वह भी बोला, और जो हमारे बीच सबसे ज्यादा चालाक, सबसे ज्यादा कनिंग हैं, वे ऐसी भाषा को बहुत, बहुत कुशल होते हैं, उसने उस नीग्रो को कहाः मित्र, इस चर्च में आए हो स्वागत है, लेकिन जब तक हृदय पवित्र नहीं है तब तक चर्च में आने से भी क्या होगा? परमात्मा के दर्शन तो तभी हो सकते हैं जब हृदय पवित्र और शांत हो। तो जाओ, पहले हृदय को करो पवित्र और फिर आना।नीग्रो वापस लौट गया। उस पुरोहित ने मन में सोचा होगा, न होगा कभी मन पवित्र और न यह आएगा। उसके आने की कोई संभावना नहीं है। दिन आए और गए, माह आए और गए और वर्ष पूरा होने को आ गया। एक दिन चर्च के पास से निकलता दिखाई पड़ा वही नीग्रो, वही काला आदमी। वह पुरोहित हैरानी में पड़ा कि कहीं वह चर्च में तो नहीं आना चाह रहा? लेकिन नहीं, उसने तो चर्च की तरफ आंख भी उठा कर न देखा और वह चला गया अपनी राह। पुरोहित देखता रहा। हैरानी हुई उसे देख कर। उस आदमी में तो कोई बड़ी चीज जैसे बदल गई थी। उसके आस-पास जैसे शांति का एक मंडल चल रहा था। जैसे उसकी आंखों में कोई नई ज्योति, कोई नई लहर आ गई थी, कोई नई खबर। जैसे वह कुछ दूसरा आदमी हो गया था, एकदम शांत और मौन। उसकी काली चमड़ी से भी जैसे कोई चमक पैदा हो गई थी, कोई पवित्रता उससे झलकने लगी थी ।

वोडाफोन ने उसके भारत छोड़ने की खबर को खारिज किया है. ब्रिटेन के वोडाफोन समूह ने इस सिलसिले में एक बयान जारी किया है. इसमें कहा गया है कि इस तरह की चर्चाएं गलत और निराधार हैं. समूह का कहना है, ‘हमारा स्थानीय प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हालात में भारत में हमारा संयुक्त उपक्रम (वोडाफोन-आइडिया) चला रहा है और हम पूरी तरह से इसके साथ खड़े हैं.’इससे पहले खबर आई थी कि वोडाफोन भारतीय बाजार से निकल सकती है. इसकी वजह उसके बढ़ते नुकसान को बताया गया था. खबर में कहा गया था कि इसके चलते वोडाफोन का बाजार पूंजीकरण घट रहा है और उसकी बैलेंस शीट भी बिगड़ रही है. यह भी बताया जा रहा था कि कंपनी को नए निवेशक नहीं मिल रहे हैं और हर महीने उसके लाखों सब्सक्राइबर उसे छोड़ रहे हैं. वोडाफोन का कहना है कि यह खबर दुर्भावना के साथ फैलाई गई है.हालांकि यह बात सच है कि वोडाफोन आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियों से जूझ रही है. वोडाफोन और आइडिया के विलय के बाद से कंपनी का शेयर लगातार नीचे गया है. इस साल जून में खत्म हुई तिमाही में उसे करीब चार हजार करोड़ रु का घाटा हुआ है. बीते साल इसी तिमाही में यह आंकड़ा करीब दो हजार सात सौ करोड़ रु था.

 

श्रग लंबे समय से फैशन ट्रेंड का हिस्सा बना हुआ है। इसकी वजह श्रग का हर तरह के ड्रेसअप के साथ आसानी से टीमअप हो जाना है। जानिए, किस तरह के श्रग, फैशन में इन दिनों बने हुए हैं और इन्हें किन ड्रेसेस के साथ टीमअप कर डिफरेंट लुक पाया जा सकता है। फैशन डिजाइनर अमृता रस्तोगी से बातचीत में उन्होंने बताया कॉलेज ऑफिस गर्ल समेत सभी महिलाएं कैसे श्रग से डिसेंट लुक पा सकती हैं...

एक सिंपल श्रग अटायर से आप अपने ड्रेसअप लुक को स्टाइलिश बना सकती हैं। कई लड़कियां सोचती हैं कि श्रग अटायर को सिर्फ वेस्टर्न आउटफिट्स के साथ ही कैरी किया जा सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है। श्रग अटायर को ट्रेडिशनल ड्रेसेस के साथ भी टीमअप किया जा सकता है। कई बॉलीवुड एक्ट्रेसेस तो साड़ी के साथ भी श्रग को टीमअप कर अपने लुक को स्टाइलिश बनाती हैं। आप भी अपने लुक को स्टाइलिश बनाने के लिए अलग-अलग ड्रेसेस के साथ श्रग को टीमअप कर सकती हैं। यह हर लेंथ में आपको आसानी से मार्केट में मिल जाएंगे। क्रॉप्ड श्रग क्रॉप्ड श्रग लंबाई में छोटे होते हैं लेकिन बहुत ही स्टाइलिश दिखते हैं। अगर आपने कोई प्रिंटेड ड्रेस पहनी है तो उसके साथ कोई सिंगल कलर वाला क्रॉप्ड श्रग पहनें। अगर आपको अपने ड्रेसअप में एक्सपेरिमेंट करना अच्छा लगता है तो ड्रेस के साथ श्रग भी प्रिंटेड पहन कैरी कर सकती हैं। आप चाहें तो वन पीस शॉर्ट ड्रेस के साथ भी क्रॉप्ड श्रग पहन सकती हैं। प्रिंटेड टेसल-फ्रिंज श्रग इस श्रग की खासियत यह है कि इसमें नीचे की तरह टेसल (धागे से बने फुंदने या गुच्छे) लगे होते हैं, जिससे आपको फंकी लुक मिलता है। इस श्रग को स्लीवलेस टॉप के साथ कैरी किया जा सकता है। इसके साथ जींस या शॉर्ट्स को टीमअप करना बेहतर रहता है। आपको अगर टेसल श्रग पसंद नहीं हैं तो आप फ्रिंज श्रग को ट्राई कर सकती हैं। इसमें भी श्रग के नीचे या बाजू पर फ्रिंज (झालर) लटके होते हैं। इससे आपको रेट्रो लुक मिलता है। इन्हें टॉप-जींस या टॉप-शॉर्ट्स के साथ पहना जा सकता है। अगर आपने मल्टीकलर ड्रेस पहनी है तो फ्रिंज श्रग हल्के कलर का ही पहनें। इन्हें आप वेस्टर्न के साथ इंडियन ड्रेसेस के साथ भी कैरी कर सकती हैं। लेस श्रग लेस श्रग तो पार्टी के लिए परफेक्ट ऑप्शन है। अलग-अलग तरह की लेस से यह श्रग बने होते हैं। आप इन्हें टैंक टॉप के साथ टीमअप कर सकती हैं। लेस श्रग, वन पीस ड्रेस के साथ भी अच्छा लगता है। आप इसे जंपसूट के साथ भी पहन सकती हैं। फ्लोरल श्रग फ्लोरल श्रग काफी ट्रेंडी, फ्रेश लुक देते हैं। यह किसी भी कलर की ड्रेस के साथ जमते हैं। आप भी अगर आसानी से स्टाइलिश लुक चाहती हैं तो फ्लोरल श्रग को ट्राई कर सकती हैं। यह पार्टी, गेट-टूगेदर के लिए भी परफेक्ट है।

अक्सर लोग उबासी लेने को नींद से जोड़ देते हैं। मगर जरुरी नहीं है कि बार-बार उबासी लेने का मतलब व्यक्ति को नींद चाहिए। कई बार यह नार्मल सी दिखने वाली आदत गंभीर बातों की तरफ भी इशारा कर सकती है। आइए जानते हैं कैसे...

तनाव

व्यक्ति जब ज्यादा तनाव में हो तो उसे उबासी आती है। तनाव के दौरान व्यक्ति का दिमाग बहुत धीरे काम करता है। कई बार उसे सामने पड़ी चीज दिखाई नहीं पड़ती। ऐसी सिचुएशन में व्यक्ति को उबासी आना लाजमी है। जैसे-जैसे व्यक्ति उबासी लेता जाता है उसका दिमाग और कम काम करने लगता है। इस परेशानी से बचने के लिए आपको जब भी तनाव महसूस हो कुछ देर के लिए अपना काम छोड़कर बाहर टहल आना चाहिए। इससे आपका दिमाग 50 प्रतिशत तक ठीक काम करने लगता है।

 

फेफड़े से संबंधित परेशानी

जब व्यक्ति तनाव में होता है तो उसके दिमाग तक ऑक्सीजन प्रॉपर नहीं पहुंच पाती। जिसका सबसे ज्यादा असर उसके फेफड़ों पर पड़ता है। ऐसी सिचुएशन में व्यक्ति को चाहिए कि वह ज्यादा से ज्यादा पानी पिए। पानी आपके शरीर में ऑक्सीजन को स्तर को नार्मल करने का काम करता है। साथ ही आपकी बॉडी को डी-टॉक्सीफाई करता है जिससे आप तनाव मुक्त रहते हैं।

दिल संबंधित परेशानियां

शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने से ब्लड को पंप करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। जब आपका शरीर ब्लड को पंप करने में एक्सट्रा एनर्जी मांगेगा तो जाहिर है उसका एनर्जी लेवल कम होगा। जिस वजह से आपको उबासी फील होगी। बॉडी में कोलेस्ट्रोल की मात्रा ज्यादा होने की वजह से भी उबासी की समस्या रहती है। जिस वजह से आपको कम उम्र में दिल से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

 

कैल्शियम जो हर किसी के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि यही वो तत्व है जो हड्डियों को मजबूती देता है। महिलाओं और बच्चों के लिए कैल्शियम बहुत जरूरी है। बच्चों के लिए जहां यह विकास के लिए जरूरी होता है, वहीं महिलाओं के लिए यह इसलिए जरूरी है क्योंकि पीरियड्स, प्रेगनेंसी, मेनोपॉज के समय शरीर में कैल्शियम की खपत बढ़ जाती है, जिसके चलते कैल्शियम की कमी सबसे ज्यादा देखने को मिलती है। खासकर 30 के बाद महिलाओं के शरीर में इसकी कमी होने लगती है इसलिए इस और ध्यान देना जरूरी हो जाता है लेकिन भारतीय औरतें इसको लेकर लापरवाही बरतती है जबकि ऐसा कर वह खुद स्वस्थ संबंधी परेशानियों को खुद ही न्योता दे देती हैं। 

कैल्शियम की कमी के चलते ही जोड़ों में दर्द रहने लगता है। इससे दांत भी कमजोर होने लगते है वहीं अगर समस्या बढ़ जाए तो गठिए होने के चांस भी बढ़ जाते हैं।

हड्डियों के लिए जरूरी है कैल्शियम

हड्डियों का 70% हिस्सा कैल्शियम फॉस्फेट से बना होता है। यही कारण है कि कैल्शियम हमारी हड्डियों की अच्छी सेहत के लिए सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व है।

किन महिलाओं को अधिक होती है समस्या

रिसर्च के अनुसार, 14 से 17 साल तक की लगभग 20% लड़कियों में कैल्शियम की कमी पाई जाती हैं। वहीं इससे ज्यादा उम्र वाली महिलाओं में लगभग 40-60% तक कैल्शियम की कमी देखने को मिलती है। दरअसल, पीरियड्स, प्रेगनेंसी, मेनोपॉज के समय शरीर में कैल्शियम की खपत बढ़ जाती है। यही कारण है कि महिलाओं में कैल्शियम की कमी सबसे ज्यादा देखने को मिलती है।

कैल्शियम की कितनी मात्रा है जरूरी

पुरुषों के मुकाबले, महिलाओं को 30 की उम्र के बाद कैल्शियम की जरूरत ज्यादा होती है। भारत में लोग हर दिन 400 ग्राम से कम कैल्शियम खाते हैं, खासतौर पर औरतें जबकि शरीर को 1200-1500 मिलीग्राम कैल्शियम चाहिए होता है।

दूध पिलाने वाली मांओं को अधिक जरूरत

प्रेगनेंट और स्तनपान करवाने वाली औरतों को न्यूटिशियंस और कैल्शियम से भरपूर आहार खाने की बहुत जरूरत होती है क्योंकि गर्भवती और बच्चे को दूध पिलाने वाली मां के शरीर से ही बच्चा का पूर्ण पोषण होता है इसलिए इन महिलाओं को दूसरी औरतों के मुकाबले कैल्शियम की भी ज्यादा जरूरत होती है।

चलिए अब जानते हैं कि आखिर इसके कारण क्या है...

-कैल्शियम की कमी की एक बड़ी वजह है डाइट। भारतीय महिलाएं अपने खान-पान को लेकर लापरवाह होती है, जो इसकी कमी का कारण बनता है।
-मेनोपॉज़ के दौरान महिलाओं को खासतौर पर ज्यादा कैल्शियम खाना चाहिए क्योंकि इस दौरान एस्ट्रोजेन हॉर्मोन का स्तर कम हो जाता है, जिससे हड्डियां पतली होने लगती हैं
-आमतौर पर लड़कियों को वैजाइनल डिस्चार्ज होता है। ये नॉर्मल है लेकिन इसमें कैल्शियम भी निकलता है। वहीं इस डिस्चार्ज में सोडियम, पोटेशियम, और मैग्नीशियम भी होता है। ऐसे में सबसे जरूरी है कि आप अपनी डाइट पर ध्यान दें।

अगर आपके शरीर में कैल्शियम की कमी हो रही हैं तो यह संकेत दिखाई देंगे...

. हड्डियां कमजोर होना
. दांतो में कमजोरी
. नाखून कमजोर होना
. पीरियड्स से जुड़ी प्रॉब्लम्स
. बालों का झड़ना
. थकावट महसूस करना
. कमजोर इम्यून सिस्टम
. धड़कन तेज होना

कुछ जरूरी बातें

-जिन औरतों में कैल्शियम की कमी होती है, उनकी हड्डियां काफी कमजोर हो जाती हैं।
-40 की से ऊपर या जिन महिलाओं को मेनोपॉज हो चुका हो उनका शरीर कैल्शियम कम मात्रा में सोखता है।
-जो औरतें केवल शाकाहारी खाना खाती हैं उनमें कैल्शियम की ज्यादा देखने को मिलती है।
-16 से 30 साल की लड़कियां जो डाइटिंग करती हैं, उनमें कैल्शियम की कमी होने की संभावना अधिक होती है।
-शरीर में विटामिन डी की कमी होने पर भी कैल्शियम कम हो जाता है क्योंकि यह कैल्शियम सोखने में मदद करता है।

कैल्शियम की कमी से क्या-क्या दिक्कतें हो सकती हैं...

. ऑस्टियोपोरोसिस
. ऑस्टियोपीनिया
. हाईपोकैल्शिमिया

कैल्शियम के लिए क्या खाएं

कैल्शियम के लिए मार्कीट में आपको अच्छे सप्लीेमेंट्स मिल जाएंगे लेकिन अगर आप कैल्शियम भरपूर डाइट खाएं तो ज्यादा फायदेमंद है। 

. दूध को संपूर्ण आहार माना जाता है, क्योंकि इसमें पोषक तत्वों की भरमार होती है। वहीं, बात आए कैल्शियम की, तो दूध का नाम सबसे पहले आता है इसके अलावा दही व पनीर भी खाएं।

. आपको खानी है हर सब्जियां जैसे पालक, पुदीना, बीन्स केल व ब्रोकली आदि इसमें आयरन, विटामिन के साथ-साथ कैल्शियम भी भरपूर होता है।

. दालें, कैल्शियम, प्रोटीन, आयरन, जिंक, पोटैशियम, फोलेट, मैग्नीशियम और फाइबर के उत्कृष्ट स्रोत हैं।

. इसकी कमी दूर रखने के लिए ड्राई फ्रूट्स खाएं। बादाम, किशमिश, सूखी खुबानी, ड्राई फ्रूट्स, खजूर आपके लिए बेस्ट हैं।

. फलों में संतरे और कीनू खाएं। इसमें विटामिन-सी के साथ-साथ कैल्शियम भी पाया जाता है। बेरीज में कैल्शियम भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है। ब्लैकबेरी और स्ट्रॉबेरी दोनों ही फायदेमंद है। 

. फल के बीजों में भी कैल्शियम भरपूर मात्रा में पाया जाता हैं, जिसका सेवन आप दूध के साथ कर सकते हैं। आप अलसी, तिल, क्विनोआ खा सकते हैं। 

. अगर आप नॉन वेज खा लेती हैं तो अंडा, मीट व सीफूड खाएं। इसमें कैल्शियम के साथ-साथ कई तरह के पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो आपकी सेहत के लिए जरूरी होते हैं।

. धूप भी लेना ना भूलें क्योंकि विटामिन डी शरीर में कैल्शियम की मात्रा को सोखता है इसलिए सुबह की हल्की धूप 5 से 20 मिनट के लिए सेंके। 

अपने आप को आम जन की सरकार कहे जानेवाली विकास का नारा देनेवाली दिल्ली की तथाकथित ईमानदार सरकार जनता के मूलभूत आवश्यकता के प्रति कितनी ईमानदार है, ये पता चलता है प्रियंका कैम्प जाने पर। जब आज के आधुनिक परिवेश में देश के राजधानी दिल्ली के जनता को मूलभूत आवश्यकताओं के अभाव से जूझते हुए देखा जाता है तो यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि भारत अब भी अपने वर्तमान स्वरूप से दो दशक पीछे है। जी हां दिल्ली के ओखला स्थित मदनपुर खादर गांव से सटे न्यू प्रियंका कैम्प की तकरीबन 20 वर्ष पुरानी घनी आबादी वाले क्षेत्र में न तो पीने के पानी की व्यवस्था है न ही शौचालय की। यहां तक कि आवागमन के लिए कैम्प का अपना कोई निजी रास्ता भी नहीं है। जिसके वजह से लोगों को आने जाने में अत्यधिक असुविधाओं का सामना करना पड़ता है, यहां के लोग जंगली रास्ते से जाने को मजबूर हैं जहां छीन झपट और छेड़खानी की घटना आम बात है। कैम्प में लोगों के शौच के लिए एक ही सुलभ शौचालय की व्यवस्था है जो यहां इतनी बड़ी आबादी की आवश्यकता की पूर्ति करने में अक्षम है।

कहा जाता है कि बच्चे ही देश एवं समाज का भविष्य होते हैं और अगर इन बच्चों को विकास का मौका न दिया जाय तो राष्ट्र और समाज का विकास अवरूद्ध हो जाता है। परन्तु यहां के बच्चों के शिक्षा के लिए यहां कोई प्राथमिक विद्यालय भी नहीं है जिसमें बच्चे पढ़ सकें। मजबूरन शिक्षार्थ बच्चों को दूर मदनपुर खादर जाना पड़ता है जहां कि उन्हें उपेक्षा का पात्र समझा जाता है। कैम्प में तो लोगों को घूमने और बच्चों को खेलने के लिए पार्क की भी व्यवस्था नहीं है। जो भी पार्क हैं कूड़ों के ढेर से भरे पड़े हैं जो कि स्वास्थ्य के बदले कुस्वास्थ्य के कारक बने हुए हैं।

यहां कि जनता विभिन्न प्रकार के समस्याओं से ग्रसित है जनप्रतिनिधि इससे बेखबर चैन की नींद ले रहे हैं यह सत्तालोसुप राजनेतागण के लिए तथा आम जन के लिए शर्मनाक बात है। और दिल्ली सरकार अपने आप को आम जन की सरकार विकास की सरकार ईमानदार सरकार होने का ढिढोरा पीट रही है यह हास्यास्पद नहीं तो और क्या है? मेरा इन सत्तालोलुप राजनेताओं से कहना है कि अब भी समय है क्षेत्र के विकास हेतु जमीनी स्तर पर कार्यशील हों और झूठ मूठ का ढिढोरा पीटना बन्द करें अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब जनता के आक्रोश का सैलाब उमड़ेगा और तमाम सत्तालोलुप राजनीतिक दल उसमें बह जाएंगे।  

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