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Monday, 14 January 2019 10:24

जाने सबूत का भार से क्या मतलब है ?

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इस लेख में हम आपको सबूत के भार यानी के बरदान ऑफ़ प्रूफ के बारे में बताएँगे| भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 101 से धारा 114 तक सबूत के भार के बारे में इसका प्रावधान किया गया है, और इसका साफ मतलब है कि किसके ऊपर यह सबूत का भार होगा, सबूत लाने की जिम्मेदारी किसकी होगी| न्यायपालिका के समक्ष अगर कोइ भी विवाद की स्थिति या केस होता है तो उसमे साक्ष्य को प्रस्तुत किया जाता है| ये साक्ष्य किस पक्ष की ओर से प्रस्तुत किया जाना है या उस अमुक साक्ष्य को साबित करने का भार भी उसी पक्ष पर होता है और जिस पक्ष को या साबित करना होता है सबूत लाना होता है माना जाता है कि उस पक्ष के ऊपर बर्डन ऑफ़ प्रूफ है, उस पक्ष के ऊपर सबूत का भार है| भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 का ज्ञान सभी को होना चाहिए और जो एडवोकेट प्रैक्टिस करते हैं उन्हें तो जरूर होना चाहिए| चाहे उन्हें क्रिमिनल मैटर यानी सिविल मैटर को देखना हो, लगभग सभी में इस अधिनियम का जिक्र होता होता है, और इसका उपयोग होता है| भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की अगर आपको जानकारी है तो किसी भी तरह के केस को हल करने में आपको बहुत मदद मिलेगी|

आइये अब विस्तार से जानते हैं कि बर्डन ऑफ़ प्रूफ क्या है| भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 101 में सबूत के भार से मतलब यह है कि जो कोइ भी न्यायालय से ये चाहता है कि वो ऐसे किसी विधिक अधिकार के दायित्व के बारे में निर्णय दें जो उन तथ्यों के अस्तित्व या मौजूदगी पर निर्भर है जिन्हें वह न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहता है जो उन तथ्यों को प्रस्तुत करता है उसे यह साबित करना होगा कि उन प्रस्तुत किये गए तथ्यों का अस्तित्व है और वो सब सबूत मौजूद हैं| जब किसी व्यक्ति को तथ्य के अस्तित्व का होना साबित करने का निर्देश दे दिया जाता है तो यह माना जाता है कि उसके ऊपर बर्डन ऑफ़ प्रूफ है|

इसे एक उदाहण से समझिये| मान लीजिये की क न्यायलय से यह चाहता है कि वह ख को उस अपराध के लिए दण्डित करने का निर्णय दे, जिसके बारे में क कहता है कि वह अमुक अपराध ख ने किया है।

तो यहाँ पर सबूत का भार क के ऊपर है,  क्योकि वह यह चाहता है कि न्यायालय ख को उसके अपराध के लिए दण्डित करने का निर्णय दे, तो क को यह साबित करना होगा की ख ने वह अमुक अपराध किया है। दूसरी चीज है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 102 - सबूत का भार किस पर होता है -  किसी वाद या कार्यवाही में सबूत का भार उस व्यक्ति पर होता है जो साक्ष्य पेश करने पर असफल हो जायेगा। यदि दोनों में से किसी ओर से कोई साक्ष्य न दिया जाये तो यह परिस्थिति पैदा होती है|

जैसे क है| क के ऊपर भूमि के लिए ख द्वारा न्यायालय में वाद दायर किया जाता है जो कि क के  कब्जे है और उस भूमि के बारे में ख कहता है कि वह भूमि क के पिता ग को एक वसीयत द्वारा ख को दी गयी है। इस भूमि के वाद में यदि दोनों पक्षकारों द्वारा भूमि से सम्बंधित कोई साक्ष्य न्यायालय के समक्ष नहीं पेश किया जाता है, तो क उस भूमि का हकदार होगा क्योकी वह उस भूमि पर अपना कब्ज़ा बनाये हुए है। इस मामले में सबूत का भार ख पर है जिसके द्वारा यह विवाद या वाद लाया गया है। तो उसे ही साबित करना होगा कि कब्जा भले ही क के द्वारा है लेकिन ओनर ख ही है| तो सबूत का भार ख पर हुआ|

उसी प्रकार से भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 103 है वह कहती है कि विशिष्ट तथ्यों के बारे में सबूत का भार किसी विशिष्ट यानीकि विशेष तथ्य के सबूत का भार उस व्यक्ति पर होता है जो न्यायालय से यह चाहता है कि उसके अस्तित्व में विश्वास करे, जब तक कि किसी विधि द्वारा यह उपबंधित न हो कि उस तथ्य के सबूत का भार किसी विशेष व्यक्ति पर होगा।

अब इसको भी एक उदाहरण से समझते हैं| क को ख किसी वस्तु की चोरी के लिए अभियोजित करता है क कहता है कि ख ने कोइ चोरी कर ली, और न्यायालय से यह चाहता है कि न्यायालय यह विश्वास करे कि क ने वस्तु की चोरी की स्वीकृति ग से की और ख को यह साबित करना होगा कि क ने वस्तु की चोरी की स्वीकृति ग से की थी।

इसमे जो चौथा सेक्शन आता है भारतीय साक्ष्य अधिनियम का वो है 104 साक्ष्य को स्वीकार्य करने हेतु बनाने के लिए जो तथ्य साबित किया जाना हो ,उसे साबित करने का भार ऐसे तथ्य को साबित करने का भार, जिसका साबित किया जाना किसी व्यक्ति को किसी अन्य तथ्य का साक्ष्य देने के समर्थ करने के लिए आवश्यक है,  ऐसे तथ्य को साबित करने का भार उस व्यक्ति पर है, जो ऐसा साक्ष्य देना चाहता है।

उदाहरण :-

क  द्वारा किये गए मृत्युकालिक कथन यानी विल यानी कि क ने अपनी मृत्यु के समय जो कथन किया था उस कथन को ख साबित करना चाहता है। तो यहाँ पर ख को क की मृत्यु साबित करनी होगी। अब क न्यायालय में किसी खोये हुए दस्तावेज के अंतर्वस्तु को द्वितीय साक्ष्य के द्वारा साबित करना चाहता है। तो , यहाँ पर क को यह साबित करना होगा कि वह दस्तावेज खो गया है।

इसी प्रकार से पांचवा जो सेक्शन है भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 105 से सम्बंधित है| और इसमें जो अभियुक्त का मामला अपवादों के अंतर्गत आता है।

जब कोई व्यक्ति किसी अपराध का अभियुक्त है,  और वह यह साबित करना चाहता है कि उसके द्वारा किया गया अपराध भारतीय दंड संहिता 1860 में उपबंधित साधारण उपवादों में से किसी के अंतर्गत या उसी संहिता के किसी अन्य भाग में, या उस अपराध को परिभाषित करने वाली किसी विधि में किसी विशेष अपवाद या किसी परन्तुक के अंतर्गत आता है,  तब उन परिस्थितयों के अस्तित्व को साबित करने का भार उस व्यक्ति पर है जो ऐसी परिस्थतियों को साबित करना चाहता है और न्यायालय ऐसी परिस्थितयों के आभाव की उपधारणा करेगा।

इसे भी उदाहरण से समझना होगा| क जो कि हत्या का अभियुक्त है,  वह अभिकथित करता है वह कहता है कि वह चित्तविकृत यानी किसी मेंटल परिस्थिति के कारण उस कार्य की प्रकृति को नहीं जानता था कि उसके द्वारा किये जाने वाले कार्य से मृत्यु हो जाएगी। तो यहाँ पर क को यह साबित करना होगा की जो उसकी मेंटल स्थिति है उस मेंटल स्थिति में वह नहीं जान सकता था कि वह जो एक्ट कर रहा है उससे किसी की ह्त्या हो जाएगी, वह मर जाएगा|

इसी प्रकार से भारतीय दंड संहिता धारा 325 के तहत क पर अगर स्वेच्छा से कोइ भी घोर उपहति करने का आरोप है। किसी के ऊपर है कि आपने बहुत गलत काम किया और इस मामले को धारा 335 के अधीन लाने वाली परिस्थितियों को साबित करने का भार क पर है।

यहाँ एक विशेष बात ये है कि यदि कोई अपराध किसी निजी सुरक्षा के अधिकार के प्रयोग के अंतर्गत किया जाता है, तो निजी सुरक्षा अधिकार के प्रयोग को साबित करने का भार अभियुक्त के ऊपर होता है|

ये कुछ सेक्शन हमने आपको बताये इसको आप एक केस लोज  के माध्यम से भी समझ सकते हैं| जो कृष्णा बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश में दिया गया है।

 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 विशेषतः ज्ञात तथ्य को साबित करने के बारे में होती है। ज्ञात तथ्य से मतलब ये है कि किसी भी परिस्थिति में अगर कोइ तथ्य पहले से मालूम है फिर भी उस साबित करने का भार उस व्यक्ति के ऊपर होता है जो व्यक्ति अभियोजन को लेकर कोर्ट के अंतर्गत गया है| इस लेख में हमने आपको कुछ सेक्शन समझाए बाकी अगले लेख में बताएँगे| इस लेख के माध्यम से हमारी कोशिश ये थी कि आपको बर्डन ऑफ़ प्रूफ के बारे में समझा सकें| अगर आम भाषा में समझना हो तो एक और उदहारण के माध्यम से समझते हैं| मान लीजिये कोइ रेप का मामला है किसी लड़की ने किसी लडके पर रेप का आरोप लगाया है तो उसने रेप नहीं किया इसको साबित करने का भार लडके के ऊपर है| लड़की ने आरोप लगाया है तो लड़की के ऊपर आरोप को साबित अरने का भार नहीं है| किसी भी एडवोकेट और किसी भीक्लाइंट के लिए जो इन्डियन एविडेंस एक्ट है उसका बहुत महत्वपूर्ण स्थान हैं| अगर आप उसे समझते हैं तो बहुत आसानी से चाहे वो सिविल मैटर हो या क्रिमिनल मैटर हो आप उसमे बहुत बेहतर कर पायेंगे|

 

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