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Friday, 10 May 2019 10:12

अन्तर्जातीय विवाह से उत्पन्न संतान की जाति क्या होगी?

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हमारे समाज में एक बहुत बड़ा सवाल है कि यदि कोई अन्तर्जातीय विवाह करता है और उनमें से एक पार्टनर अनुसूचित जाति या जनजाति का होता है तो उनकी संतान को किस जाति में रखा जाता है। अन्तर्जातीय विवाह की संतान को पारम्पकि हिन्दू विधि यानी कानून में वर्ण शंकर कहते हैं और वह शूद्रो की श्रेणी में आतेहैं। अब एक और प्रश्न आता है कि क्या आधुनिक विधि में उन्हें शूद्र कहकर अनुसूचचित जाति का लाभ दे सकते हैं। दरअसल यह प्रश्न केरल राज्य में सपना बनाम केरल राज्य (1993 केरल),में उस समय उठा जब केरल सरकार ने एक अधिनियम पारित किया। इसके अन्तर्गत यह उपबन्ध बनाया गया कि अन्तर्जातीय विवाहों की संतान को अनुसूचित जातियों के मिलने वाले लाभ दिये जाएंगे। लेकिन केरल उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि ऐसे विवाह की संताने अनुसूचित जाति की सदस्य नहीं हो सकती हैं। तब यह प्रश्न उठता है कि जब वर्ण शंकर यदि उच्च जाति के सदस्य नहीं हो सकते तो उन्हें शूद्र जाति का सदस्य क्यूं ना माना जाए।

ऐसे में अन्तर्जातीय संतान को माँ की जाति में माना जाता है। इस मामले पर आरक्षण पर आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी मुहर लगाता है। न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायामूर्ति प्रकाश देसाई की पीठ ने रमेशभाई दभाई नाइका की गुजरात सरकार के फैसले को अपील करने वाली याचिका को बरकरार रखते हुए का कि अन्तर्जातीय विवाह से उत्पन्न हुए बच्चे को आरक्षण के लाभ से इसलिये वंचित नहीं रखा जा सकता कि उसका पिता उच्च वर्ग से है।

गौरतलब है कि गुजरात सरकार ने याचिकाकर्ता को अनुसूचित जनजाति के तहत आरक्षण देने से इनकार कर दिया था क्योंकि उसके पिता उच्च क्षत्रिय समुदाय के थे। पीठ ने कहा अन्तर्जातीय विवाह या आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच विवाह से जन्में बच्चे का जाति निर्धारण प्रत्येक मामले में अन्तर्निहित तथ्यों के आधार पर होना चाहिये। शीर्ष न्यायाय ने कहा कि अन्तर्जातीय विवाह या आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच विवाह में एक पूर्व धारणा हो सकती है कि बच्चे को पिता की जाति मिले।

तो ये थे दो अलग धर्म और जातियों के लोगो के शादी करने से पैदा हुई संतान के सम्बन्ध में जानकारी| यदि आपके पास इसी तरह का कोइ सवाल है तो आप हमें कमेन्ट बोक्स में लिख कर पूछ सकते हैं|

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