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Monday, 05 August 2019 10:23

बाबा साहेब ने क्यों जला दी थी मनु स्मृति

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जब भी हिन्दू विधि यानि कानून की बात होती है तो मनु स्मृति का जिक्र जरूर आता है। मनु स्मृति का नाम आम तौर पर विवादों में ही रहता है। महिलाओं और शूद्रों के प्रति कुतर्क से भरे अपने कुछ अध्यायो के बावजूद भी मनु स्मृति भारतीय विधि से किस तरह जुड़ गई इसकी एक रोचक कहानी है। जिसे सुनाने से पहले हिन्दू विधि के मुख्य स्रोत को जानना जरूरी हिन्दू विधि के 7 मुख्य स्रोत है जिन्हे वर्गों में बांटा गया है जिसमें पहले में 4 और दूसरे वर्ग में 3 स्रोत आते हैं।

पहला प्राचीन या मूल स्रोत

  • श्रुति
  • स्मृति
  • टीका एवं निबन्ध
  • रूढ़ियाँ

दूसरा आधुनिक या द्वीतीय स्रोत

  • साम्या न्याय, और सुआत्मा
  • पूर्व-निर्णय यानी किसी मिलते-जुलते मामले में आने फैसले
  • विधान

हम सीधे बात करते हैं स्मृति की। स्मृति यानि याद। ऐसा माना जाता है कि ऋषि मुनियों ने अपनी स्मृति के आधार पर देवों की वाणी को वेदों में लिखा उसे ही स्मृति कहा गया। स्मृति के साथ ही विधि यानि कानून का क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित युग का आरम्भ हुआ। यही भारतीय विधि का स्वर्ण युग था। आज जब हम विधि के रूप में स्मृति की बात करते हैं तब मनु स्मृति का जिक्र होता है। आज मैं आपको मनु स्मृति के भारतीय विधि के आधार बनने की कहानी बताउँगा।

जब भारत में अंग्रेजी शासन था तब उन्होंने न्याय व्यवस्था में इसकी सहायता ली। अंग्रेजो का मानना था कि जिस तरह शरिया मुसलमानों के यहाँ न्याय का धर्म आधार है उसी तरह मनु स्मृति हिन्दुओं के लिये है। बस यहीं से मनु स्मृति भारतीय विधि का अंग बन गया इसी के आधार पर अंग्रेजों के जमाने में मुकदमों के फैसले होने लगे।

स्मृतियों में मनु स्मृति का महत्वपूर्ण स्थान है। मनु स्मृति में 12अध्याय और 2694श्लोक हैं। मनु स्मृति के संकलन की तिथि ईसा से 200साल पहले की मानी जाती है। हालाँकि इसके कुछ अध्याय बहुत अच्छे हैं लेकिन अध्याय पाँच महिलाओं और शुद्रों के खिलाफ है जो आधुनिक युग में स्वीकार्य नहीं है। ना ही न्याय संगत है। इसी वजह से 25 जुलाई 1927को बाबा साहेब ने मनु स्मृति को जला दिया था। तो ये थी मनु स्मृति की कहानी जो आये दिन विवादों में रहती है।

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