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Monday, 16 March 2020 17:11

खोये सांस्कृतिक उजालों की तलाश

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भारतीय संस्कृति पर गर्व करने वालों की आज भी कमी नहीं। इसे स्वीकार करके इससे प्राप्त आदर्शों, मूल्यों और सिद्धांतों को अंगीकार करने के संदेश देने वाले आज भी देश के मार्गदर्शक और मनीषी कहलाते हैं। आज भी राष्ट्र की एक सौ पैंतीस करोड़ जनता भारत के नवनिर्माण का संकल्प हर पल दुहराती है। बेसीदा मूल्यों का परित्याग करके एक समतावादी समाज की रचना करना यह संकल्प है। स्वामी विवेकानंद जैसे चिन्तकों ने तो धर्म और राष्ट्रीयता को कुछ इस प्रकार संशलिष्ट कर दिया कि राष्ट्र अर्चना ही धर्म अर्चना बन गयी थी। भारत जैसे देश में ही भारत मां की कल्पना देवी तुल्य हो सकती है और इसका निरन्तर परिष्कार जन-जन का धर्म।
आज स्वाधीनता की हम तिहत्तरवीं वर्षगांठ मना चुके। भारत को लोकतंत्र घोषित हुए सत्तर बरस हो गये। कतार में खड़ा आखिरी आदमी भी आज देश का उतना ही प्रतिष्ठित भाग्य नियंता है, जितना कि कतार में खड़ा पहला व्यक्ति। हमारी इंटरनेट से लेकर अंतरिक्ष विजय तक की उपलब्धियां इस देश को विश्व के मानचित्र पर सर्वश्रेष्ठ देशों के वर्ग में प्रतिष्ठित कर देती हैं। हमारे देश के भाग्यनियंता बताते हैं कि हमारे देश के सांस्कृतिक गौरव के पीछे हमारा सदियों का परिश्रम है, युग चेतना है, साहित्य और ललित कलाओं की सार्थक परंपरा है, जिसका मात्र परिचय ही किसी भी अत्याधुनिक देश के मसीहा को अभिभूत कर सकता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे कि अभी दुनिया के सबसे धनी देश के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपनी भारत यात्रा में ताजमहल देखकर लगा था।लेकिन प्रश्न पैदा होता है कि क्या आजादी या लोकतंत्र की लगभग पौन सदी में हम भारत की इस गौरवशाली परंपरा को जीवित रख सके? क्या भारत और समाज के नवनिर्माण के संकल्प और प्रतिबद्धता को देश की युवा पीढ़ी को एक मूल्यवान विरासत के रूप में भेंट कर सके? जमीनी यथार्थ का सामना करें तो स्पष्ट हो जाता है कि अभी तक सिवा इन आदर्शों और संकल्पों को एक बड़बोलेपन की तश्तरी में अपनी युवा पीढ़ी को पेश करने के कोई भी नया बल या संवेदना नहीं दे सके।जिन आदर्शों के साथ देश की नव निर्माण यात्रा शुरू हुई थी, वह आज जैसे अधर में रुक गयी है। संकल्प था देश में अमीर और गरीब का भेद समाप्त कर देंगे, मिश्रित अर्थव्यवस्था बनायेंगे, जिसमें निरंतर विस्तृत होता हुआ सार्वजनिक क्षेत्र जन कल्याण को समर्पित रहेगा, न लाभ-न हानि के आधार पर जनसेवा को समर्पित रहेगा। लेकिन हुआ क्या? समतावादी समाज की स्थापना तो नेताओं के बड़बोले भाषणों तक ही सिमट कर रह गयी। अमीर और अमीर तथा गरीब और भी अधिक गरीब होते चले गये। असमानता इतनी कि देश के मुट्ठी भर अरबपतियों की धन सम्पदा देश की एक वर्ष की बजट राशि के बराबर हो गयी है। दस प्रतिशत धनपति देश की नब्बे प्रतिशत सम्पदा पर कब्जा किये हैं और नब्बे प्रतिशत सर्वहारा दस प्रतिशत राष्ट्रीय सम्पदा से गुजर बसर करता है। लेकिन नेताओं के भाषणों के छद्म तेवर रहे कि वह कतार के आखिरी आदमी के जनकल्याण को आज भी समर्पित है।लेकिन कैसे? इसके लिए सपना मिश्रित अर्थव्यवस्था और विस्तृत होते सार्वजनिक क्षेत्र में देखा गया था, उसे निकम्मा और असफल घोषित करके द्रुत आर्थिक विकास के लिए देश के उदारीकरण और निजीकरण की घोषणा की गयी है। जन युवा संचेतना के ध्वजवाहक इन लोगों ने परवाह नहीं की कि चोर दरवाजा संस्कृति से देश में निजी क्षेत्र का प्रवेश हुआ और फिर वह सार्वजनिक क्षेत्र का विकल्प बन गया। यह राष्ट्र निर्माण के कथित प्रयासों में जन कल्याण की भावना को तिरोहित कर गया और उसके स्थान पर अरबपतियों की एक एेसी जमात को देश के विकास का सूत्रधार बना गया, जिसका लक्ष्य अपने लिए अधिक से अिधक लाभ कमाना था। हर वर्ष कार्य योग्य काम मांगती सवा करोड़ युवा पीढ़ी को रोजगार नहीं मिला। नेहरू युग के आर्थिक चिंतन में योजना आयोग की स्थापना के साथ उसकी देखरेख में योजनाबद्ध आर्थिक विकास को अपनाया गया था, जिसका लक्ष्य कृषि और औद्योगिक क्रांति, हर हाथ के लिए काम और कीमत नियंत्रण था।बारह पंचवर्षीय योजनाओं के रास्ते पर यह देश चला है। लेकिन जब युग बदला और अच्छे दिन लाने का वायदों भरा मोदी युग आया तो पंचवर्षीय योजनाओं को असफल घोषित कर दिया गया और योजना आयोग देश की अर्थव्यवस्था पर लदा हुआ एक सफेद हाथी घोषित हो गया।रास्ते बदलने की घोषणा हुई। योजना आयोग नीति आयोग बन गया। उसने आर्थिक विकास की कौन सी योजनाओं को अपनाया है? फिलहाल इसका कोई स्पष्ट फैसला नहीं हो सका। नयी नीतियां बनाने की घोषणा होती रहती है लेकिन वर्तमान शासन की दूसरी पारी शुरू होने के बावजूद देश की युवा पीढ़ी को कोई नयी शिक्षा नीति नहीं दी जा सकी। नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि देश में नवनिर्माण और विकास के सब दावों के बावजूद देश के युवकों में बेकारी का प्रतिशत और बढ़ गया है।उधर यह देश, जिसकी पहचान हमेशा एक कृषक देश के रूप में होती थी जहां के लोग खेतीबाड़ी को एक धंधा नहीं, जीने का अंदाज मानते थे, वहां कृषि विकास दर गिरकर शून्य या दो प्रतिशत तक चली गयी। इस क्षेत्र में वार्षिक विकास का लक्ष्य चार प्रतिशत रखा गया जो कि एक कृषक देश के लिए निराशाजनक है। यहां विदेशों में कृषि आधारित संस्कृति का विकास कृषि आधारित उद्योगों के सहयोग से हो, की तरह का कोई माहौल नहीं बना। इसलिए भारत की युवा पीढ़ी कृषि को जीने के अंदाज मानने वाले दर्शन से च्युत हो गयी। उसके साथ ही उसकी पुश्तैनी धरती और लोक संस्कृति से जुड़ी हुई सब स्थापनायें भी उसके मानस से खारिज हो गयीं।धरती का आसरा छूट गया तो कृषक संस्कृति का गौरव भी देश के लिए अजनबी हो गया। रोटी और संस्कृति को समर्पित रहने के इस टकराव में लोगों को उनके लिए रोटी प्राप्त करना ही सर्वोपरि बना। इसलिए देश के नौजवानों का पलायन लाखों की तादाद में, गांवों से शहरों की ओर होने लगा।लेकिन शहरों में  उनके लिए रोजगार कहां है? काम मांगते इन आगंतुकों के लिए वहां कोई काम नहीं। साल में सौ दिन काम की दिलासा देने वाला मनरेगा भी उनके लिए फर्जीवाड़ा साबित हुआ। उन्होंने अपने टूटे हुए डैनों से विदेशों की ओर रोजगार की चाह में उड़ान भरनी चाही। लेकिन वहां विश्वव्यापी मंदी का बेरहम माहौल उन्हें अपना इंतजार करता मिला। यहां ‘अमेरिका अमेरिकियों के लिए’ और उसकी तर्ज पर ‘यूरोप यूरोपीयों के लिए’ उनके वास्ते दीवारें खड़ी कर रहा था।एेसी हालत में बेकाम होती युवा पीढ़ी क्या करे? अवसाद के घेरों में डूब नशों के रसातल में डूबना कोई विकल्प नहीं। बेहतर हो अगर श्रम गहन लघु और कुटीर उद्योगों का पुनर्जीवन और कृषि आधारित उद्योगों का नव विकास उन्हें अपनी धरती की ओर लौटने का सन्देश दे। इस परिचित माहौल में वापसी उन्हें  अपने खोये हुए सांस्कृतिक उजाले तलाशने में मदद देगी।

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